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निगम को करोड़ों का फटका ! 1.5 करोड़ जमा कराए बिना ही सुन ली 3 करोड़ टैक्स मामले की अपील

मप्र म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट को किया तार-तार; बड़े टैक्स बकायेदार को दी अनुचित राहत, आम जनता पर सख्ती और रसूखदारों पर मेहरबानी उजागर

@अंशुल मित्तल /​ग्वालियर : एक तरफ जहां नगर निगम आम जनता से संपत्तिकर (Property Tax) की पाई-पाई वसूलने के लिए जब्ती, कुर्की और तालाबंदी जैसे कड़े कदम उठा रहा है, वहीं दूसरी तरफ निगम की अपनी ही ‘अपील समिति’ नियमों को ताक पर रखकर रसूखदारों को करोड़ों रुपये का फायदा पहुंचाने में जुटी है। ताजा मामला ग्वालियर के ‘भारतीय विद्या निकेतन स्कूल’ से जुड़ा है, जहां नगर निगम के ही जिम्मेदार अफसरों और समिति ने मध्य प्रदेश म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन किया है। इस मामले में स्कूल पर बकाया 3 करोड़ रुपए के टैक्स की मांग के विरुद्ध अपील स्वीकार करने से पहले नियमानुसार ₹1.5 करोड़ निगम के खाते में जमा होने थे, जो कि नहीं कराए गए। नियमों को दरकिनार कर दी गई इस अनुचित राहत से नगर निगम को सीधे-सीधे डेढ़ करोड़ रुपये (₹1.5 करोड़) का तात्कालिक फटका लगा है।

करोड़ो का टैक्स बकाया, निगम ने दिया था तालाबंदी का नोटिस

पूरा मामला भारतीय विद्या निकेतन स्कूल पर बकाया भारी-भरकम संपत्तिकर से जुड़ा है। निगम के राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, इस स्कूल पर तकरीबन 3 करोड़ रुपये का टैक्स बकाया है। लंबे समय तक टैक्स न चुकाए जाने के बाद, नगर निगम के कर वसूली अमले ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्कूल प्रबंधन को ‘तालाबंदी’ (सीलिंग) का अंतिम नोटिस जारी किया था।

इस कार्रवाई से बचने के लिए स्कूल के संचालकों ने यह तर्क दिया था कि “स्कूल और शिक्षा संस्थान संपत्तिकर के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए उन पर टैक्स नहीं लगाया जा सकता।” हालांकि, नगर निगम के संपत्तिकर विभाग वार्ड 59 के APTO और अन्य जिम्मेदार जांचकर्ताओं द्वारा जुटाए गए पुख्ता सबूतों से यह साफ हो चुका था कि यह स्कूल किसी भी प्रकार की टैक्स छूट के कानूनी दायरे में नहीं आता है और इस पर टैक्स की देनदारी शत-प्रतिशत बनती है।

‘मप्र म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट’ की उड़ी धज्जियां: क्या है कानून ?

टैक्स वसूली और तालाबंदी के इस नोटिस के विरुद्ध भारतीय विद्या निकेतन स्कूल प्रबंधन ने नगर निगम की अपील समिति (Appeal Committee) के समक्ष एक याचिका दायर की। लेकिन यहां सारा खेल नियमों को ताक पर रखकर खेला गया।

मध्य प्रदेश म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट 1956 की उपधारा 3 के अनुसार : एक्ट के पेज नंबर 190-191 पर उल्लेखित,  उपधारा 3 कहती है कि “कोई भी टैक्स संबंधी अपील तब तक स्वीकार (Accept) या प्रोसेस नहीं की जा सकती, जब तक अपीलकर्ता (टैक्सपेयर) मांगी गई कुल टैक्स राशि का 50% हिस्सा तुरंत नगर निगम के खाते में अग्रिम जमा न करा दे।”

इस कानून के गणित को समझें तो, चूंकि स्कूल के खिलाफ 3 करोड़ रुपये के टैक्स की मांग की गई थी, इसलिए उनकी अपील को रजिस्टर करने या स्वीकार करने से पहले स्कूल प्रबंधन से तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपये (₹1.5 करोड़) निगम के खाते में जमा कराए जाने अनिवार्य थे।


निगम को सीधे-सीधे ₹1.5 करोड़ का घाटा?

​सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, नगर निगम की अपील समिति ने कानून का पालन करने के बजाय, रसूख के आगे घुटने टेक दिए। समिति ने अप्रैल माह के शुरुआती दिनों में एक बड़ा कारनामा करते हुए, स्कूल प्रबंधन से बिना 50% राशि (डेढ़ करोड़ रुपये) जमा कराए ही नगर निगम के खिलाफ उनकी अपील को स्वीकार कर लिया।

यदि नियम का पालन होता, तो आज नगर निगम के खजाने में ₹1.5 करोड़ की नकदी जमा हो चुकी होती। लेकिन अधिकारियों की मेहरबानी के चलते स्कूल को बिना एक भी रुपया जमा किए कानूनी राहत और संरक्षण मिल गया, जिससे निगम के खाते में आने वाली यह भारी-भरकम राशि अटक गई। यह सीधे तौर पर निगम के राजस्व को पहुंचाया गया ₹1.5 करोड़ का सीधा घाटा है।


आम जनता पर चौतरफा दबाव, रसूखदारों के लिए रेड कार्पेट

अपील समिति के इस फैसले ने नगर निगम के दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया है। शहर की मासूम और आम जनता, जो थोड़ा सा भी टैक्स बकाया होने पर निगम की सख्ती, नोटिस और मानसिक दबाव का सामना करती है, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। एक तरफ आम नागरिकों के घरों और दुकानों पर मामूली बकाये के लिए तालेबंदी जैसी कार्रवाई की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ 3 करोड़ के बकायेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को भी “मैनेज” किया जा रहा है।


जनता के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारी-भरकम टैक्स वसूलने के बदले में उन्हें नगर निगम से कितनी और कैसी सुविधाएं मिल रही हैं, यह जगजाहिर है। बदहाल बुनियादी सुविधाओं के बीच, निगम के अपने ही जिम्मेदार जनप्रतिनिधि साठगांठ करके, निगम को करोड़ों रुपये की चपत लगा रहे हैं। अब देखना यह है कि इस गंभीर वित्तीय और कानूनी अनियमितता पर उच्च आला अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं और क्या इस अपील को निरस्त कर राशि वसूली जाएगी ?

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