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नगर निगम: मलाईदार सीटों पर कब्जा जमाने, अफसरों के चहेते इंजीनियर का “रास्ता साफ” !

घोटाले की निर्माण मंजूरी, अवैध कॉलोनीयों को संरक्षण जैसे मामले और EOW की जांचों में घिरे अफसर को मिलेगी नगर की प्लानिंग की जिम्मेदारी ?

अंशुल मित्तल, ग्वालियर / नगर निगम से अफसरों के अचानक हुए तबादले के बाद, खाली हुई कुर्सियों को लेकर विभाग में चर्चाओं का माहौल गर्म है। बात करें सिटी प्लानर की कुर्सी की, तो अंदरखानों में खबर है कि ‘यह कुर्सी तो साहिबानों के चहेते, इंजीनियर के लिए ही खाली करवाई गई है, वरना इतनी जल्दी रिलीविंग थोड़ी ना होती…”!

अभी हाल ही में प्रदेश स्तर पर हुए बड़े तबादले आदेशों के साथ ग्वालियर निगम के तीन अफसर पवन सिंघल, महेंद्र अग्रवाल और बृज किशोर त्यागी को क्रमशः सागर, मुरैना और बुरहानपुर भेज दिया गया। महेंद्र अग्रवाल का ट्रांसफर होने से सिटी प्लानर की कुर्सी खाली हो गई है। अब महकमें में चर्चा है कि ‘अफसरों की एकतरफा कृपा पाने वाले और तगड़ी राजनीतिक पैठ रखने वाले, राकेश कश्यप को यह कुर्सी, समझो मिल ही गई ‘ !

हालांकि बीते समय में राकेश कश्यप की तमाम गड़बड़ी और लापरवाहियां सामने आती रही हैं लेकिन कृपा तो कृपा होती है। जैसे कई अनियमितताओं के बावजूद उन्हें कॉलोनी सेल का मुखिया बना दिया गया, वैसे ही सिटी प्लानर के प्रभार से नवाजा जाना भी बड़ी बात नहीं होगी !

खेल नोटिस का: अवैध कॉलोनियों को ‘संरक्षण’ या वसूली का जरिया ?

​राकेश कश्यप जब जोन क्रमांक-6 में भवन अधिकारी (BO) थे, तब उन पर गंभीर आरोप लगे। वार्ड 32 में मंदिर की जमीन पर फल-फूल रही अवैध कॉलोनियों को कथित तौर पर खुला संरक्षण दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि इनसे ठीक पहले पदस्थ रहे भवन अधिकारी त्यागी ने इसी क्षेत्र में भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर खौफ पैदा किया था, लेकिन कश्यप के आते ही समीकरण बदल गए।

  • कार्रवाई के नाम पर कागजी खानापूर्ति : वार्ड 32 में अवैध निर्माणों के खिलाफ महज 24 घंटे की समय-सीमा वाले नोटिस जारी किए गए।
  • नतीजा सिफर : समय-सीमा बीतने के बाद भी धरातल पर बुलडोजर नहीं चला। यह चर्चा आम है कि ये नोटिस अवैध निर्माण रोकने के लिए नहीं, बल्कि ‘ब्लैकमेलिंग और संगठित वसूली’ के खेल को अंजाम देने के लिए जारी किए गए थे।

EOW की जांच और GDA के पत्र से खुला घालमेल

​सिटी सेंटर मेन रोड जैसे वीआईपी इलाके (वार्ड 30) में श्रीमती ताराबाई आदि के नाम पर जारी की गई एक संदिग्ध भवन निर्माण मंजूरी आज भी जांच के दायरे में है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) और ग्वालियर विकास प्राधिकरण (GDA) के पत्रों ने इस पूरे खेल को बेनकाब किया था। नियम-विरुद्ध दी गई इस मंजूरी के पीछे भी तत्कालीन बिल्डिंग ऑफिसर राकेश कश्यप की मुख्य भूमिका सामने आई थी।

  • कार्रवाई से मिला ‘अभयदान’: मामला तूल पकड़ने पर निगम आयुक्त ने उस विवादित मंजूरी सहित एक अन्य पेंडिंग आवेदन को निरस्त तो कर दिया, लेकिन मुख्य किरदार (कश्यप) को आंच तक नहीं आने दी गई।
  • पुरस्कार में मिली मलाईदार पोस्टिंग : जांच से बचाने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें इनाम के तौर पर ‘कॉलोनी सेल’ के मुखिया की मलाईदार कुर्सी सौंप दी गई।

सरकारी जमीन भी लगाई गई ठिकाने…

वार्ड 28 में थाठीपुर थाने के पास सर्वे नंबर 307 की सरकारी जमीन पर भवन निर्माण मंजूरी देने का मामला किसी से छुपा नहीं है। पटवारी के फर्जी हस्ताक्षर कर बनाए गए एक फर्जी नजरी नक्शा के आधार पर करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन को विवादित बना दिया गया। यह कारनामा भी क्षेत्र के तत्कालीन भवन अधिकारी राकेश कश्यप द्वारा किया गया था। सूत्र बताते हैं कि यह जमीन, संजीवनी क्लिनिक बनाने के लिए भी आवंटित की जा चुकी थी। अफसरों के मुताबिक मामला अभी जांच में है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि घोटाले को ठंडे बस्ते में डाल, दबाने की तैयारी है !


तमाम कारनामों के बावजूद इंजीनियर राकेश कश्यप पर कोई कार्रवाई न होना, लगातार अफसरों की कृपा मिलना और अब यह “अपकमिंग ताजपोशी” ? इस “असीम-कृपा” के पीछे की वजहों को लेकर विभाग में कई तरह की चर्चाएं हैं। लेकिन साफ है कि इस तरह की कार्यप्रणाली से कहीं ना कहीं घोटालेबाजों के हौसले बुलंद होते हैं और भ्रष्टाचार को शह मिलती है। अंततः विभागीय साख, नियमों और शहर का होता है बंटाधार…।

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