MP सरकार का बड़ा फैसला: अवैध कॉलोनी में रजिस्ट्री से हटाई रोक। भूमाफिया को मिली ऑक्सीजन, आमजन को असमंजस !
राज्य शासन का सख्त आदेश— सब-रजिस्ट्रार केवल पहचान जांचें, NOC की अनिवार्यता खत्म; लेकिन विशेषज्ञों ने उठाए सवाल— अगर बाद में चला बुल्डोजर, तो किसे मिलेगी राहत और कौन झेलेगा मार ?

अंशुल मित्तल-8770226566
Registration Illegal Colonies /भोपाल / ग्वालियर : अवैध कॉलोनियों में प्लॉट और मकानों की रजिस्ट्री को लेकर, राज्य सरकार ने एक बेहद बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। वाणिज्य कर विभाग द्वारा जारी नए आदेश के अनुसार, अब जिला प्रशासन या नगर निगम ‘अवैध कॉलोनी’ के नाम पर किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री पर रोक नहीं लगा सकते। सरकार ने साफ कर दिया है कि ऐसी कॉलोनियों में रजिस्ट्री के लिए किसी भी तरह की अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) की अनिवार्यता पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
हालांकि एक्सपर्ट्स की माने तो शासन के इस फैसले ने राहत से ज्यादा, नए विवादों और गंभीर सवालों को जन्म दे दिया है। शहरी विकास विशेषज्ञों और आम जनता के बीच अब यह बड़ा संशय है कि यदि अवैध कॉलोनाइजर रजिस्ट्री कराकर पैसा वसूल लेते हैं, तो बाद में नगर निगम की तोड़फोड़ या कानूनी कार्रवाई की मार कौन झेलेगा—
## सरकार ने आदेश में क्या कहा ? (4 प्रमुख निर्देश)
शासन ने कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए, 26 मई को जारी आदेश में कलेक्टर और कमिश्नर को निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
- रजिस्ट्री मालिकाना हक का अंतिम सबूत नहीं : आदेश में कहा गया है कि किसी भी दस्तावेज का पंजीयन (रजिस्ट्री) उस संपत्ति के स्वत्व (मालिकाना हक) का अंतिम और पक्का प्रमाण नहीं होता है।
- पंजीयन अधिकारी जांचकर्ता नहीं हैं : सब-रजिस्ट्रार का काम केवल दस्तावेज लिखाने वालों की पहचान करना और उनकी आपसी सहमति को जांचना है। कॉलोनी वैध है या अवैध, इसकी विस्तृत जांच का भार उन पर डालना कानून के खिलाफ है।
- इनकार के नियम बेहद सीमित : मध्य प्रदेश पंजीयन नियम के तहत केवल गिने-चुने और विशिष्ट कारणों से ही रजिस्ट्री रोकी जा सकती है। किसी भी सामान्य प्रशासनिक आदेश के दम पर रजिस्ट्री से इनकार नहीं किया जा सकता।
- नियम 23 का गलत इस्तेमाल बंद हो : मप्र नगरपालिका नियम, 2021 के नियम 23 का हवाला देकर जो एनओसी मांगी जा रही है, वह केवल एक निश्चित कट-ऑफ तारीख से पहले की अवैध कॉलोनियों के लिए है। इसका सामान्यीकरण कर हर रजिस्ट्री को रोकना पूरी तरह गलत है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला :
इस आदेश में मप्र बनाम पूरन सिंह नरवरिया (2014) मामले का संदर्भ दिया गया है, जिसमें देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने साफ कहा था कि अवैध निर्माण या अवैध कॉलोनाइजेशन की जांच करना पंजीयन विभाग के अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
“अवैध कॉलोनी” की प्रविष्टि का दावा भी अधूरा
प्रशासन पहले दावा कर चुका था कि जिन जमीनों पर अवैध कॉलोनियां विकसित हो रही हैं, उनके खसरे-खतौनी में “अवैध कॉलोनी” दर्ज किया जाएगा ताकि आम जनता सतर्क रह सके। लेकिन जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था अब तक प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाई है।
फैसले से बढ़ी असमंजस और खड़े हुए सवाल
शासन के इस फैसले के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं—
- यदि अवैध कॉलोनाइजर रजिस्ट्री कराकर मुनाफा वसूल लेगा, तो बाद में कार्रवाई की मार कौन झेलेगा — बिल्डर या आम खरीदार ?
- जिन अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत से अवैध कॉलोनियां विकसित हुईं, उनकी जिम्मेदारी तय करते हुए ,उन पर कार्रवाई कब होगी ?
- क्या सरकार धीरे-धीरे सभी अवैध कॉलोनियों को वैध करने की दिशा में बढ़ रही है ?
- क्या अवैध कॉलोनी में रजिस्ट्री कराने वाले नागरिकों को नगर निगम और टीएंडसीपी जैसे विभागों से भवन निर्माण अनुमति मिलेगी ?
- या फिर लोग रजिस्ट्री पर लाखों रुपया खर्च करने के बावजूद, हमेशा अवैध निर्माण की कार्रवाई के डर में जीवन बिताएंगे ?
कॉलोनाइजरों में खुशी, जनता में संशय
शासन के फैसले के बाद कॉलोनाइजरों में उत्साह का माहौल बताया जा रहा है। वहीं शहरी विकास और नगर नियोजन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सख्त निगरानी नहीं हुई तो प्रदेश में अवैध कॉलोनियों का जाल और तेजी से फैल सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है —क्या यह फैसला आम जनता को राहत देगा, या अवैध कॉलोनियों के कारोबार को “नई ऑक्सीजन” साबित होगा ?




