टैक्स ID घोटाले में निगम की कार्रवाई पर बड़ा सवाल: एक फर्जी रजिस्ट्री में दो खरीदार, कार्रवाई में एक का नाम गायब !

@अंशुल मित्तल, ग्वालियर / नगर निगम में सामने आए संपत्तिकर ID घोटाले में निगम द्वारा की गई कार्रवाई ही अब सवालों के घेरे में हैं ! फर्जी दस्तावेजों के आधार पर की गई रजिस्ट्री के मामले में दो निगम कर्मचारियों सहित रजिस्ट्री से जुड़े क्रेता-विक्रेता के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई।
लेकिन उसी रजिस्ट्री में दर्ज एक अन्य खरीदार का नाम कार्रवाई से गायब है। सवाल यह है कि जब घोटाले के सभी जिम्मेदारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की नियत थी तो कार्रवाई के दौरान एक खरीदार का नाम आखिर क्यों हटाया गया ?
एक रजिस्ट्री… दो खरीदार… लेकिन FIR में सिर्फ एक !
मामला वार्ड नंबर 30 में स्थित करीब 3000 वर्गफुट की संपत्ति से जुड़ा है। शिकायत के मुताबिक, संपत्ति के वास्तविक मालिक विजय की संपत्तिकर ID के रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जयनारायण को संपत्ति का मालिक/विक्रेता दर्शाते हुए 15 मई 2025 को रजिस्ट्री कराई गई।
रजिस्ट्री में संपत्ति के क्रेताओं के रूप में अशोक सिंह और धर्मेंद्र सिंह पुत्र हरचरण सिंह, दोनों के नाम दर्ज बताए जा रहे हैं।
यानी दस्तावेज में विक्रेता एक और खरीदार दो—लेकिन निगम द्वारा की गई FIR कार्रवाई में विक्रेता जयनारायण और खरीदार अशोक सिंह का नाम तो सामने आया, जबकि दूसरे खरीदार धर्मेंद्र सिंह का नाम कार्रवाई से बाहर हो गया।
यहीं से उठता है सबसे बड़ा सवाल—क्यों ?
जांच के बाद, यदि निगम ने दस्तावेजों के आधार पर, रजिस्ट्री को फर्जीवाड़े का हिस्सा माना और उससे जुड़े लोगों पर FIR कराने की कार्रवाई की गई, तो फिर उसी दस्तावेज में दर्ज दूसरे खरीदार को कार्रवाई के दायरे से बाहर रखने का आधार क्या था ?
- जब रजिस्ट्री में दो खरीदार दर्ज हैं तो FIR में एक का नाम क्यों ?
- क्या कार्रवाई के समय, वरिष्ठ अफसरों को भी अंधेरे में रखा गया ?
- क्या FIR से पहले सभी रजिस्ट्री पक्षकारों की भूमिका की जांच की गई ?
- अगर धर्मेंद्र सिंह की भूमिका संदिग्ध नहीं थी, तो उसका नाम छुपाया क्यों गया ?
- अगर उनकी भूमिका की जांच ही नहीं हुई, तो फिर एक ही मामले से जुड़े लोगों पर, कार्रवाई का पैमाना अलग-अलग क्यों रखा गया ?
सिर्फ घोटाले की नहीं, कार्रवाई की भी हो जाँच !
Property tax ID में हेरफेर और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर रजिस्ट्री जैसे गंभीर मामले में पक्षपातपूर्ण कार्रवाई करते हुए धर्मेंद्र सिंह का नाम मामले से बाहर किया गया।
जब एक क्रेता पर FIR करवाई गई तो दूसरे का नाम क्यों हटाया गया। इसका कोई लिखित कारण भी स्पष्ट नहीं किया गया। ऐसे में निगम की कार्रवाई पर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। घोटाले की फाइल में नाम दर्ज था… FIR की बारी आई तो नाम गायब हो गया—अब सवाल यह है कि यह महज जांच की प्रक्रिया थी या “एक्शन में करप्शन का तड़का…?”
क्या कहती है अफसरों की चुप्पी ?
इस पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की हकीकत जानने के लिए निगम के अपर आयुक्त मुनीष सिकरवार को फोन और व्हाट्सएप मैसेज के माध्यम से संपर्क किया गया लेकिन नहीं उन्होंने फोन रिसीव किया और ना ही मैसेज का कोई रिप्लाई किया।

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