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6 अवैध कॉलोनियों पर चला निगम का बुल्डोजर। क्या जिम्मेदार अफसरों पर भी गिरेगी गाज?

प्रशासनिक कार्रवाई के बाद कई जगहों पर दोबारा शुरू हो जाता है अवैध निर्माण, इसके लिए जिम्मेदार कौन ?

ग्वालियर | 11 मार्च बुधवार को नगर निगम प्रशासन ने अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध अपना अभियान तेज करते हुए ग्राम सालूपुरा में कार्रवाई को अंजाम दिया। नगर निगम आयुक्त संघ प्रिय एवं अपर आयुक्त टी. प्रतीक राव के निर्देशानुसार, वार्ड क्र. 66 के अंतर्गत लगभग 15.30 हेक्टेयर भूमि पर विकसित की जा रहीं 06 अवैध कॉलोनियों के निर्माणों को जमींदोज कर दिया गया।

बिना मंजूरी बिछा, अवैध निर्माण का जाल

नगर तथा ग्राम निवेश (T&CP) और नगर निगम की मंजूरी के बिना ही कॉलोनाइजरों ने इन क्षेत्रों में सड़कें, सीवर लाइन, बाउण्ड्रीवॉल और विद्युत पोल खड़े कर दिए थे। निगम की टीम ने सर्वे क्र. 56/3, 145, 148, 525 सहित अन्य सर्वे नंबरों पर कार्रवाई करते हुए पुष्पा साहू, रंजीत गुर्जर, एम.जी.एस. डवलपर्स, और राधेश्याम डवलपर्स (सौरभ जैन) जैसे कॉलोनाइजरों द्वारा किए गए अवैध विकास कार्यों को हटा दिया।

भारी अमला मौजूद, तब उखाड़े अवैध कॉलोनी की रोड और चेंबर के ढक्कन

कार्रवाई के दौरान मौके पर सिटी प्लानर महेन्द्र अग्रवाल, भवन अधिकारी पवन शर्मा, भवन निरीक्षक रवि गोडिया और मदाखलत अधिकारी शैलेन्द्र सिंह चौहान सहित पुलिस बल उपस्थित रहा। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि चयनित 66 अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध यह अभियान के प्रथम चरण की शुरुआत है और आने वाले दिनों में अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह की कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी।

बड़ा सवाल: जनता के टैक्स पर पलने वाले अमले की चुप्पी का राज क्या?

इस पूरी कार्रवाई के बीच एक बड़ा और वाजिब सवाल खड़ा होता है— जब निगम के पास अवैध निर्माणों को रोकने के लिए एक भारी-भरकम अमला मौजूद है, जिस पर जनता के टैक्स का बेहिसाब धन खर्च किया जाता है, तो उनकी नाक के नीचे इतनी बड़ी कॉलोनियां विकसित कैसे हो गईं ? सिटी प्लानर से लेकर क्षेत्र के टाइम टाइम कीपर तक का अमला क्या काम करता है ? क्या केवल बुल्डोजर चलाकर वाहवाही लूटना ही काफी है ? उन अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जाती जिनकी जिम्मेदारी इन निर्माणों को शुरुआती दौर में ही रोकने की थी ? क्या अवैध कॉलोनियों के निर्माण होने पर उन जिम्मेदार अफसरों पर सख्त कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए ?

सतत् निगरानी का अभाव: कार्रवाई के बाद फिर शुरू होता है खेल

​प्रशासन द्वारा अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई के साथ यह भी जरूरी है कि निगम के जिम्मेदार यहाँ सतत निगरानी रखें। अक्सर देखा जा रहा है कि जिन अवैध निर्माण या कॉलोनियों पर प्रशासनिक कार्यवाही कर वाहवाही लूटी जाती है, प्रशासन के मुँह फेरते ही वहाँ अवैध निर्माण दोबारा शुरू हो जाते हैं। यदि निगरानी तंत्र इतना ही कमजोर है, तो क्या यह माना जाए कि अवैध कॉलोनाइजरों और जिम्मेदार अफसरों के बीच कोई “मौन समझौता” है ?

निष्कर्ष : अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई तब तक अधूरी है, जब तक उन अधिकारियों पर भी गाज न गिरे जिन्होंने अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरती और अवैध प्लाटिंग को फलने-फूलने का मौका दिया। जनता के धन और विश्वास को बचाने के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति धरातल पर दिखनी चाहिए।

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