
“निगम में नामुमकिन.. कुछ भी नहीं” इस स्लोगन को चरितार्थ करता, निगम का एक और भर्ती घोटाला जांच एजेंसी के संज्ञान में आया है। निगम की अपरायुक्त (वित्त) रजनी शुक्ला और पूर्व कमिश्नर अमन वैष्णव के खिलाफ हुई शिकायत पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने जहां शुरू कर दी है। शिकायत सेनेटरी इंस्पेक्टर की भर्ती से जुड़ी है। जिसमें निगम के वरिष्ठ अफसरों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं।
ग्वालियर। सितंबर 2025 में एक्टिविस्ट संदीप शर्मा ने नगरीय प्रशासन मंत्री और मुख्यमंत्री सहित कई जांच एजेंसियों को लिखित शिकायत के माध्यम से अवगत कराया कि वर्ष 2024 में तत्कालीन निगम कमिश्नर अमन वैष्णव और अपर आयुक्त रजनी शुक्ला ने भ्रष्टाचार करते हुए, नियमों के विरुद्ध जाकर, आदिति सिंह को सेनेटरी इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त किया। शिकायत में स्पष्ट है कि जब यह नियुक्ति की गई तब अदिति सिंह इस नियुक्ति के लिए पात्र नहीं थीं।
डिप्लोमा डिग्री ने खोली भ्रष्टाचार की पोल
शासन ने स्वच्छता सर्वेक्षण के कामों में तेजी लाने के लिए नगरीय निकायों में स्वच्छता इंस्पेक्टर के पद की भर्ती निकाली थी। भर्ती प्रक्रिया के नियमों और शर्तों के अनुसार, इस पद के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थी के पास, वर्ष 2021-22 या उससे पहले, एलएसजीडी डिप्लोमा सहित अन्य शैक्षणिक और तकनीकी योग्यताओं के सर्टिफिकेट होना चाहिए थे। शिकायत है कि निगम के तत्कालीन कमिश्नर अमन वैष्णव ने 3 सितंबर 2024 को एक नियुक्ति आदेश जारी कर, जबलपुर निवासी अदिति सिंह को, ग्वालियर निगम में स्वच्छता निरीक्षक के पद पर नियुक्त किया। अदिति सिंह ने एलएसजीडी की परीक्षा वर्ष 2021-22 में नहीं बल्कि 2023 में उत्तीर्ण की है। तत्कालीन निगम आयुक्त अमन वैष्णव ने भ्रष्टाचार के चलते इस तथ्य को अनदेखा किया। मूल विभाग सामान्य प्रशासन रखते हुए, अदिति सिंह को स्वच्छता निरीक्षक के पद पर नियुक्त कर दिया गया था।
खजाना संभालने वाली, एड.कमिश्नर को, कैसे नहीं दिखे यह कागज ?
किसी भी कर्मचारी का पहला वेतन निकालने से पहले, उस कर्मचारी की मूल फाइल अपर आयुक्त, वित्त के समक्ष पेश की जाती है। अपर आयुक्त (वित्त) की जिम्मेदारी होती है कि कर्मचारी की फाइल में संलग्न दस्तावेजों का परीक्षण करें और कमी पाए जाने पर कमिश्नर को अवगत कराते हुए कार्रवाई करें। लेकिन अदिति सिंह के मामले में, भ्रष्टाचार की फाइल सामने होते हुए भी, अपर आयुक्त रजनी शुक्ला ने आंखें बंद कर रखीं और 11 महीनों तक, अदिति सिंह का वेतन निकाला जाता रहा। शिकायत किए जाने तक अदिति सिंह ने 3.5 लाख रुपए वेतन आहरण किया है। पूरे मामले में अपर आयुक्त रजनी शुक्ला की मौन स्वीकृति स्पष्ट होती है।
अदिति सिंह के त्यागपत्र का ड्रामा भी रहा था चर्चा में !
सूत्र बताते हैं कि यहां तकरीबन 5 लाख रुपए का प्रसाद चढ़ाने के बाद यह नियुक्ति की गई थी! शिकायत में उल्लेख है कि तत्कालीन कमिश्नर और अन्य अधिकारियों के दबाव में आकर अदिति सिंह ने 28 अगस्त 2025 को अपना त्यागपत्र निगम के सामान्य प्रशासन विभाग में प्रस्तुत किया था। हालांकि कमिश्नर संघ प्रिय ने अदिति सिंह के त्यागपत्र को स्वीकार नहीं किया था। लेकिन यह त्यागपत्र किसके दबाव में दिया गया था यह भी जांच का विषय है।
एक्टिविस्ट के जवाब के बाद निगम से होंगे जवाब-तलब !
पूरे मामले में ईओडब्ल्यू ने शिकायत को पंजीबद्ध करते हुए, शिकायतकर्ता संदीप शर्मा को पत्र जारी कर कथन और तथ्य प्रस्तुत करने के लिए समय दिया है। जाहिर है कि एक्टिविस्ट के कथन दर्ज करने के बाद, नगर निगम से जवाब तलब किया जाएगा। देखने यह है कि निगम की तरफ से क्या सफाई पेश की जाती है…।
गौरतलब है कि अभी हाल ही में नगर निगम से एक और घोटाला सामने आया था जिसमें विनियमित कर्मचारी नीरज श्रीवास्तव को 2014 में उस डिप्लोमा के आधार पर प्रमोशन दे दिया गया था। जो डिप्लोमा 2016 में कंप्लीट हुआ था। हालांकि कमिश्नर संघ प्रिय ने इस पर खड़ा रुख दिखाते हुए कड़ी कार्रवाई के आदेश जारी किए।
जल्द देखें-
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