प्रॉपर्टी आईडी में घोटाले, कमिश्नर ने किया बर्खास्त। संविदा कर्मचारी ने त्यागपत्र वायरल कर, रचा ड्रामा
संगीन भ्रष्टाचार पर भी सिर्फ पद से ही तो हटाया था, FIR तो नहीं हुई थी ?

@अंशुल मित्तल, ग्वालियर। नगर निगम से रिटायरमेंट के बाद, बाबू के पद पर संविदा पर नियुक्ति पाने वाले कर्मचारी महेंद्र शर्मा का त्यागपत्र बीते रोज सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर वायरल होता रहा। अचानक वायरल होने वाला यह त्यागपत्र, कार्रवाई से बचने और नाक बचाने के लिए, किया जाने वाला ‘ड्रामा’ साबित हो रहा है।

आखिर क्यों गढ़ा गया ‘त्यागपत्र’ का ड्रामा ?
ज्ञात हो कि महेंद्र शर्मा (संविदा कर्मचारी) ने सहा. संपत्तिकर अधिकारी रहते हुए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर, संपत्तिकर आईडी में संशोधन किया और संपत्तियों को खुर्द-बुर्द करने में भूमाफियाओं की सहायता की। इस तरह के तीन कारनामों में वे दोषी पाए गए थे। खबर में दिखाए गए पत्र के अनुसार, घोटालेबाजी सामने आने के बाद कमिश्नर ने इन्हें संपत्तिकर के सभी दायित्वों से यह लिखते हुए हटा दिया था कि ‘महेंद्र शर्मा विभाग में रहते हुए जांच को प्रभावित कर सकते हैं…’। साफ है कि “इससे पहले विभाग द्वारा FIR करा दी जाए, त्यागपत्र वायरल कर दो ।” इस त्यागपत्र को वायरल करना ही कहा जा सकता है क्योंकि यह त्यागपत्र नगर निगम में आवक नहीं कराया गया बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल किया गया👇

संविदा नियुक्ति के पीछे का उद्देश्य, पूरा या अधूरा ?
निगम के अंदरखानों में चर्चा है कि तकरीबन 40 साल नौकरी करने वाले महेंद्र शर्मा, निगम की सेवा के लिए संविदा पर नहीं आए थे। सूत्र बताते हैं कि इन्होंने संविदा नियुक्ति के लिए खासी मशक्कत की और इस मशक्कत के पीछे थे, कुछ बड़े कामों को निपटाने के उद्देश्य। सूत्रों का कहना है कि इनका एक उद्देश्य पूरा हुआ जिसमें तकरीबन एक करोड़ का चढ़ावा हाथ लगा। यह वही मामला है जिसमें निगम के हाथ से करोड़ों की, बेशकीमती जमीन निकल गई ! परिस्थितियोंवश दूसरा उद्देश्य पूरा होने की संभावनाएं कम होती गईं…।
बड़े घोटालेबाजों को “अभयदान” मिलने की परपाटी ने बनाया बेखौफ
फर्जी आईडी घोटाले की ही बात करें तो संविदा कर्मचारी, महेंद्र शर्मा पर तीन घोटाले साबित हुए थे। जबकि नियमित कर्मचारी तरुण कुशवाहा पर वार्ड 58 में टीसी रहते, एक आईडी में संशोधन और ट्रांसफर कर फर्जीवाड़े का आरोप साबित हुआ था। तरुण कुशवाहा को तत्काल सस्पेंड कर दिया गया था। लेकिन महेंद्र शर्मा को न केवल संपत्तिकर विभाग से हटाते हुए अभयदान दिया गया, बल्कि सहा. राजस्व अधिकारी के पद से नवाजा गया। फर्जी आईडी बनाकर भूमाफियाओं के साथ लाखों-करोड़ों का घोटाला करने के मामलों पर आज तक नगर निगम द्वारा कोई मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया। यह यह कार्यप्रणाली घोटालेबाजों को अभयदान और संरक्षण देना नहीं है तो क्या है ?
“पहले ही हटा चुके हैं, त्यागपत्र के कोई मायने नहीं”- निगमायुक्त
मामले पर निगमायुक्त से पूछा गया कि फर्जी आईडी घोटाले के तीन मामलों में आरोप सिद्ध होने के बाद महेंद्र शर्मा पर क्या कार्रवाई बनती है। इस पर कमिश्नर संघ प्रिय का कहना था कि “तीन-चार दिन पहले ही महेंद्र शर्मा को सेवा से बर्खास्त करने की नोटशीट लिखी जा चुकी है। आगे कार्रवाई के लिए भी लिखेंगे। इसके बाद उनके द्वारा दिया गया त्यागपत्र बेमानी है।”
कमिश्नर द्वारा लिखी नोटशीट कहां गई ?
नगर निगम के सामान्य प्रशासन विभाग और संपत्तिकर विभाग के अधिकारियों से जानकारी ली गई कि जब कमिश्नर ने महेंद्र शर्मा को हटाने के लिए नोटशीट लिख दी, तो अब तक आदेश जारी क्यों नहीं हुआ ? इस सवाल पर सभी ने दबी आवाज में, कमिश्नर द्वारा लिखी गई ऐसी किसी भी नोटशीट से अनभिज्ञता जताई।




