Video – निगम में भ्रष्टाचार के सिंडिकेट का खुलासा, वीडियो स्टिंग से उपजे सवाल, साहिबानो की ईमानदारी पर सवालिया निशान !
अवैध कालोनी काटने वाले 51 से अधिक लोगों पर कलेक्टर ने मुकदमा दर्ज करने के आदेश जारी किये हैं, सवाल- जिम्मेदार अफसरों पर कार्यवाई कब... ?

अंशुल मित्तल, ग्वालियर। एक तरफ जिला प्रशासन अवैध कॉलोनाइजरों पर शिकंजा कसने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम का भ्रष्ट सिस्टम प्रशासनिक मंशा पर बट्टा लगा रहा है। शहर के दो अलग-अलग वार्डों में किए गए ‘वीडियो स्टिंग’ ने निगम की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है। इन वीडियो में भू-माफिया खुलेआम दावा कर रहे हैं कि निगम के अफसरों को “ले-देकर” अवैध निर्माण का लाइसेंस मिल जाता है।
Video स्टिंग 1: वार्ड 21 में ‘प्यार वाली सेटिंग’ से फल-फूल रहा खेल
वार्ड 21 में चल रहे अवैध कॉलोनी के खेल की पड़ताल जब स्टिंग के जरिए की गई, तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। यहाँ कॉलोनी काट रहे कॉलोनाइजर ने कैमरे पर बेखौफ होकर स्वीकार किया कि उनकी कॉलोनी ‘कच्ची’ (अवैध) है। जब उनसे निगम की कार्रवाई का डर पूछा गया, तो सिस्टम को शर्मसार करने वाला जवाब मिला। कॉलोनाइजर कि ऑफिस में बैठे व्यक्ति का कहना था कि “कच्ची कॉलोनी है, निगम से परमिशन लेने पर तो महंगा पड़ेगा, प्यार से बात कर लेना….।” लिंक पर क्लिक कर देखें Video..
Video स्टिंग 2: ‘दागी’ अफसरों के संरक्षण में मंदिर की जमीन पर डाका
वार्ड 32 के चुन्नीपुरा मोहल्ले में गंगा दास की बड़ी शाला रामजानकी मंदिर (माफी औकाफ) की करोड़ों की सरकारी जमीन को नोटरी कर, खुर्द-बुर्द किया जा रहा है। यहाँ भू-माफिया के गुर्गे यह कहते सुने गए कि जेडओ और अफसरों से लेनदेन करके ही पूरी प्लॉटिंग हो रही है।
हैरानी की बात यह है कि यहाँ वही भवन अधिकारी तैनात हैं जिनके कारनामे इन दिनों लोकायुक्त और EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) में सुर्खियां बटोर रहे हैं। वहीं, यहाँ के जेडओ (ZO) आशीष राजपूत तो पहले ही अपना ऑडियो वायरल होने के बाद ‘कमीशन सेट’ करने के खेल में माहिर माने जाते हैं। ऐसे दागी अफसरों की मौजूदगी में सरकारी और मंदिर की जमीन की बंदरबाँट होना सिस्टम पर सवाल खड़े करता है।
नोट- दोनों ही मामलों में बने वीडियो स्टिंग के बारे में निगम अफसरों से बातचीत की गई, लेकिन ऑन रिकॉर्ड कोई भी, कुछ बोलने को तैयार नहीं…
निगम अफसर : अवैध निर्माण रोकने के लिए या वसूली के लिए ?
अवैध निर्माण रोकने के लिए भवन शाखा का पूरा एक सिस्टम काम करता है, जिसमें टाइम कीपर से लेकर भवन अधिकारी तक की भूमिका होती है। सरकार द्वारा बेहिसाब पैसा खर्च कर, इन्हें गाड़ी, डीजल और ड्राइवर जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी गाड़ी और डीजल जैसी सुविधाओं का उपयोग अवैध निर्माण रोकने के बजाय अवैध वसूली के लिए “फील्ड विजिट” करने में किया जा रहा है।
कमिश्नर का मौन : ईमानदारी या लाचारी ?
निगम कमिश्नर संघ प्रिय की पहचान एक ईमानदार अधिकारी की है। लेकिन सवाल यह है कि शहरभर में अवैध निर्माण की शिकायतों के बावजूद उन्होंने आज तक इन ‘दागी’ भवन अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं की ? जब “चहेते” अफसरों के नाम जांच एजेंसियों के रडार पर हों और स्टिंग में उनकी ‘सेटिंग’ के सबूत मिल रहे हों, तो कमिश्नर की चुप्पी, उनकी निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाती है।
अवैध कॉलोनियों की सूची में जिम्मेदार अफसरों के नाम नदारद क्यों
51 भू-माफियाओं पर कलेक्टर द्वारा की गई FIR की कार्रवाई स्वागत योग्य है। लेकिन उन अधिकारियों की सूची कहाँ है जिनकी शह पर शहर में अवैध कॉलोनियां खड़ी हुईं हैं ?
निष्कर्ष :
इन दो वीडियो स्टिंग और अफसरों के पिछले ट्रैक रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि भू-माफिया जो कह रहे हैं, वह सच है ! अब देखना है कि क्या कमिश्नर अब इन ‘कमीशनखोर’ अधिकारियों पर गाज गिराएंगे या फिर शहर को यूं ही भू-माफियाओं के हवाले छोड़ दिया जाएगा ?




