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​सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: UGC के नए नियमों पर रोक, 2012 के प्रावधान बहाल

अदालती आदेश- ​भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित UGC के नए नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। देशभर में इस नियम का पुरजोर विरोध देखा जा रहा था । याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि नए नियम भेदभावपूर्ण हैं क्योंकि ये ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को केवल SC, ST और OBC वर्गों तक सीमित करते हैं, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया है। कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए 2012 के नियमों को फिर से जीवित कर दिया है ताकि छात्रों के पास शिकायत निवारण का तंत्र बना रहे।

​ नए नियमों की संकुचित परिभाषा, विवाद की जड़

​विवाद मुख्य रूप से नए रेगुलेशन की धारा 3(c) को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नियम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (उल्टा भेदभाव) को बढ़ावा देता है। जहाँ पुराने 2012 के नियम अधिक समावेशी थे, वहीं नए नियमों में “पीड़ित” की परिभाषा को संकुचित कर दिया गया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तारीख निर्धारित की गई है। अदालत ने चिंता जताई कि नए नियमों के तहत हॉस्टलों में अलगाव या अलग व्यवस्था जैसे प्रावधान समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं।

अदालत ने की तीखी टिप्पणी: “क्या नया कानून हमें पीछे ले जाएगा?”

​मामले की गंभीरता को देखते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कड़े सवाल उठाए हैं। कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • आजादी और जातिवाद: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सवाल किया कि आजादी के 75 साल बाद भी हम जातियों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। उन्होंने पूछा, “क्या यह नया कानून हमें पीछे ले जाएगा?”
  • अमेरिका का उदाहरण: बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने अमेरिका के पुराने नस्लीय भेदभाव वाले दौर का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में कभी अश्वेत और श्वेत बच्चों को अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाया जाता था।
  • भविष्य की आशंका: जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि उन्हें उम्मीद है कि भारत में हम कभी वैसी स्थिति तक नहीं पहुंचेंगे जहाँ शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का अलगाव देखने को मिले।

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