नगर निगम का अनोखा ‘पक्षपात’: जमीन हारते ही नामांतरण की फुर्ती, अवैध को गिराने में ‘कंटेंप्ट’ के बाद भी सुस्ती

@अंशुल मित्तल, ग्वालियर। नगर निगम अभी हाल ही में करोड़ों रुपए कीमत की जमीन का केस हारा है, जहां मुरार स्थित सर्वे नंबर 2916 की जमीन के मामले में सुप्रीम कोर्ट में निगम की अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद निगम ने तत्परता दिखाते हुए जीते हुए पक्षकार के पक्ष में संपत्तिकर नामांतरण भी कर दिया। लेकिन कुछ अन्य मामलों पर नजर डालें तो यह दिखता है कि नगर निगम में, कोर्ट के आदेशों का पालन करने में, सीधे तौर पर पक्षपात हो रहा है। आगे बढ़ें, उससे पहले नजर डालते हैं उस केस पर, जिसमें निगम करोड़ों की संपत्ति, संभवतः जीत सकता था !
शहर के बारादरी चौराहे पर स्थित यह जमीन, रेवेन्यू रिकॉर्ड में वर्ष 2010 तक “शासकीय भूमि” दर्ज थी। मोहनलाल सराफ मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट ने इस संपत्ति के 7312 वर्गफुट भाग पर अपना दावा किया। ट्रस्ट का तर्क था कि उन्होंने यह जमीन लीजकर्ता म.प्र. भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा, भोपाल से लिखतम लीज डीड 11 सितंबर 1998 के जरिए प्राप्त की है।
लीज डीड में नदारत अहम बिंदु !
बेशकीमती जमीन के संबंध में भोपाल और ग्वालियर दोनों संस्थाओं के बीच संपादित की गई लीजडीड में कहीं इस बात का जिक्र नहीं था कि लीजकर्ता के पास यह संपत्ति कहां से आई एवं किस अधिकार से उन्होंने यह संपत्ति मोहनलाल सराफ मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के नाम कर दी? तत्कालीन समय में निगम के विधिक अधिकारी एडवोकेट कमल जैन ने भी अपने अभिमत में इस बिंदु का उल्लेख किया था। सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन संपत्तिकर अधिकारियों ने भी यह बिंदु, नोटशीट में दर्ज किया है !

‘अपील में अरुचि’ क्या बनी हार का कारण ?
पूर्व निगमायुक्त हर्ष सिंह ने पत्र (4 अप्रैल 2024) के जरिए आदेश जारी किया था कि मामले की अपील तत्काल हाईकोर्ट में की जाए। इस पत्र के अनुसार निगम वर्ष 2009 में जिला न्यायालय से यह केस हार गया था। यह सवाल बनता है कि वर्ष 2009 के बाद 2024 तक हाईकोर्ट में अपील क्यों नहीं की गई ? निगम के अंदरखानों में, एक करोड़ के लेनदेन जैसी भी कुछ चर्चाएं सुनने में आ रही हैं।
बहरहाल निगम ने यह जमीन हारते ही, फुर्ती के साथ, जीते हुए पक्षकार के पक्ष में, संपत्तिकर नामांतरण भी कर दिया।
यहां हाईकोर्ट से मिली फटकार, माफी मांगी, फिर भी आदेश का पालन नहीं।
निगम के जोन-10, वार्ड-22 में बन रही एक बहुमंजिला मल्टी स्टोरी की विरुद्ध शिकायतें दी गईं कि इस बिल्डिंग के बेतरतीब निर्माण से पड़ोसी का मकान जर्जर हो गया निगम ने कोई कार्रवाई नहीं की। मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद:
- हाईकोर्ट आदेश दिनांक 20 जून 2025- जारी आदेश में कमिश्नर को निर्देशित किया कि अवैध निर्माण को चार सप्ताह के अंदर हटाया जाए।
- कोर्ट के आदेश के हवाले से जारी, इस अवैध निर्माण को हटाने का निगमायुक्त का आदेश 25 अगस्त 2025 भी हवा में।
- आदेश का पालन न होने पर हाईकोर्ट से निगमायुक्त संघ प्रिय को मिला कंटेंप्ट नोटिस दिनांक 28 अगस्त 2025.
- हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कमिश्नर स्वयं उपस्थित होकर मामले पर रिपोर्ट प्रस्तुत करें ।
- कमिश्नर की ओर से हाईकोर्ट को दिये गए, रिप्लाई पत्र 18 नवंबर 2025 में स्वयं उपस्थित रहने से रिलीफ मांगते हुए, बिना शर्त माफी की मांग की, अवैध निर्माण पर जल्द कार्रवाई करने की बात लिखी।
एक तरफ कोर्ट के फैसले पर मोहर लगते ही, अपनी ही जमीन से हाथ धोने में इतनी फुर्ती ? दूसरी तरफ कोर्ट की फटकार और आदेश के बावजूद इस तरह की सुस्ती ? इस रवैये को न्यायालय के आदेश मानने में “पक्षपात” कहना गलत नहीं होगा !




